चिकित्सा को बनाया सेवा की पतवार
जिंदगी इंद्रधनुषी घेरा है कहीं रात कहीं सबेरा है जिंदगी की पगडंडी पर चलकर देखिए दूर तलक एहसासों का ही बसेरा है। मानसिक दृढ़ता के रथ पर सवार होकर डॉ.शिरीष डिंगरे ने अपनी सेवा भावी पहचान को बहु आयाम दिए है। इंद्रधनुषी रूपी जिंदगी के हर क्षण में वे आगे बढ़ते गए और आखिरकार आज वे संत रिचर्ड पंपुरी हास्पिटल के अधीक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे है। डॉ.डिंगरे ने विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए इंदौर एमजीएम मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया और गुजरात के सूरत के पास एक गांव में अपनी सेवाएं दी। इसकेे बाद प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर यूपीएससी के माध्यम से चयनित होकर दादर नगर हवेली में भी लगभग ढ़ाई साल नौकरी की।
बदली दिशा
डॉ.डिंगरे को आर्मी में नौकरी करने का सपना विषमताओं के चलते पूरा नहीं हो पाया। एक बार फिर उन्होने यूपीएससी के माध्यम से रेलवे की परीक्षा दी और चयनित भी हो गए। यहीं से उनकी जिंदगी के कार्य क्षेत्र की दिशा बदली और अपाइंटमेंट लेटर मिलने में चंूकि समय था इसलिए उन्होने शहर के इमलीपुरा क्षेत्र में सन् 1986 में एक छोटे से कमरे से प्रेक्टिस शुरू की ताकि वक्त का सदुपयोग हो सके। लेकिन बाद में प्रेक्टिस के रूप में की सेवा ही उन्हे रास आई और नौकरी नहीं करने का मन लिया। उस दौर में शहर को युवा वर्ग के एमबीबीएस डॉक्टरों की सौगात मिली थी उसमें डॉ.डिंगरे भी शामिल थे।
कार्य क्षेत्र में विस्तार
सेवा का जज्बा लिए प्रेक्टिस में उतरे डॉ.डिंगरे का सेवा शुल्क तत्कालीन दौर में नाम मात्र ही था जो आज की परिस्थितियों के अनुसार भी कायम है और विश्वास की कसौटी का पैमाने का ग्राफ भी बढ़ा है। चूंकि डॉक्टरी पेशे को वे सेवा भाव मानते थे इसकारण से वे निजी संस्थाओं से जुडे इनमें मिशनरी की नवजीवन संस्था,देशागांव एवं भगवानपुरा मिशनरी को दी गई सेवाएं भी शामिल है। इसके अलावा वे कई चिकित्सा शिविरों का अहम हिस्सा भी बनेें।
पेरेलल कार्डियोलॉजी की सौगात
प्रेक्टिस के दौरान मरीजों को आने वाली परेशानियों से अवगत होते हुए डॉ.डिंगरे ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक कदम और बढ़ाया जो दिल के मरीजों के लिए वरदान साबित हुए। डॉ. डिंगरे पूर्व में मिशनरी संस्था की ओर से जर्मनी के एक अस्पताल में लगभग एक साल तक गेस्ट फिजिशियन बतौर कार्य किया था। यहीं से पेरेलल कार्डियोलॉजी तकनीक की दिशा में कदम बढ़ाया और वापिस आकर इसे अंजाम दिया। इस तकनीक की विशेषता है कि इसका प्रयोग कर हार्ड पेशेंट बायपास सर्जरी से बच सकते है। सस्ती,सरल और सहज पेरेलल कार्डियोलॉजी में पेशेंट का चेकअप कर महज एक घंटे प्रतिदिन का समय पेंशेंट को मशीन पर देना होता है। इससे पेशेंट के हार्ड और नलीयों के ब्लाकेज खत्म हो जाते है। निश्चित समयावधि के बाद मरीज पूर्णत:नार्मल हो जाता है और ऑपरेशन की झंझट से मुक्ति मिलती है।
संतुलित एवं संयमित जीवन के पर्याय डॉ.डिंगरे की दिनचर्या अल सुबह ही शुरू हो जाती है। प्रतिदिन मार्निंग वॉक एवं घर में बनाए जिम में वे एक्सरसाइज करते है। शहर में संपूर्ण जांच के लिए एक सेंटर की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध है जहां पेशेंट को नाम मात्र शुल्क पर ही समस्त जांच उपलब्ध हो सकेगी। इस दिशा में उनके प्रयास संत रिचर्ड पंपुराी अस्पताल से प्रारंभ भी हो गए है। साहित्य के प्रति उनका गहरा लगाव है और फुर्सत के समय वे प्रेरणादायक किताबें पढऩा पसंद करते है।
POSTED BY jaishreedadajiworldnews.com
"TRANSLATE YOUR OWN LANGUAGE"
जिंदगी इंद्रधनुषी घेरा है कहीं रात कहीं सबेरा है जिंदगी की पगडंडी पर चलकर देखिए दूर तलक एहसासों का ही बसेरा है। मानसिक दृढ़ता के रथ पर सवार होकर डॉ.शिरीष डिंगरे ने अपनी सेवा भावी पहचान को बहु आयाम दिए है। इंद्रधनुषी रूपी जिंदगी के हर क्षण में वे आगे बढ़ते गए और आखिरकार आज वे संत रिचर्ड पंपुरी हास्पिटल के अधीक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे है। डॉ.डिंगरे ने विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए इंदौर एमजीएम मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया और गुजरात के सूरत के पास एक गांव में अपनी सेवाएं दी। इसकेे बाद प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर यूपीएससी के माध्यम से चयनित होकर दादर नगर हवेली में भी लगभग ढ़ाई साल नौकरी की।
बदली दिशा
डॉ.डिंगरे को आर्मी में नौकरी करने का सपना विषमताओं के चलते पूरा नहीं हो पाया। एक बार फिर उन्होने यूपीएससी के माध्यम से रेलवे की परीक्षा दी और चयनित भी हो गए। यहीं से उनकी जिंदगी के कार्य क्षेत्र की दिशा बदली और अपाइंटमेंट लेटर मिलने में चंूकि समय था इसलिए उन्होने शहर के इमलीपुरा क्षेत्र में सन् 1986 में एक छोटे से कमरे से प्रेक्टिस शुरू की ताकि वक्त का सदुपयोग हो सके। लेकिन बाद में प्रेक्टिस के रूप में की सेवा ही उन्हे रास आई और नौकरी नहीं करने का मन लिया। उस दौर में शहर को युवा वर्ग के एमबीबीएस डॉक्टरों की सौगात मिली थी उसमें डॉ.डिंगरे भी शामिल थे।
कार्य क्षेत्र में विस्तार
सेवा का जज्बा लिए प्रेक्टिस में उतरे डॉ.डिंगरे का सेवा शुल्क तत्कालीन दौर में नाम मात्र ही था जो आज की परिस्थितियों के अनुसार भी कायम है और विश्वास की कसौटी का पैमाने का ग्राफ भी बढ़ा है। चूंकि डॉक्टरी पेशे को वे सेवा भाव मानते थे इसकारण से वे निजी संस्थाओं से जुडे इनमें मिशनरी की नवजीवन संस्था,देशागांव एवं भगवानपुरा मिशनरी को दी गई सेवाएं भी शामिल है। इसके अलावा वे कई चिकित्सा शिविरों का अहम हिस्सा भी बनेें।
पेरेलल कार्डियोलॉजी की सौगात
प्रेक्टिस के दौरान मरीजों को आने वाली परेशानियों से अवगत होते हुए डॉ.डिंगरे ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक कदम और बढ़ाया जो दिल के मरीजों के लिए वरदान साबित हुए। डॉ. डिंगरे पूर्व में मिशनरी संस्था की ओर से जर्मनी के एक अस्पताल में लगभग एक साल तक गेस्ट फिजिशियन बतौर कार्य किया था। यहीं से पेरेलल कार्डियोलॉजी तकनीक की दिशा में कदम बढ़ाया और वापिस आकर इसे अंजाम दिया। इस तकनीक की विशेषता है कि इसका प्रयोग कर हार्ड पेशेंट बायपास सर्जरी से बच सकते है। सस्ती,सरल और सहज पेरेलल कार्डियोलॉजी में पेशेंट का चेकअप कर महज एक घंटे प्रतिदिन का समय पेंशेंट को मशीन पर देना होता है। इससे पेशेंट के हार्ड और नलीयों के ब्लाकेज खत्म हो जाते है। निश्चित समयावधि के बाद मरीज पूर्णत:नार्मल हो जाता है और ऑपरेशन की झंझट से मुक्ति मिलती है।
संतुलित एवं संयमित जीवन के पर्याय डॉ.डिंगरे की दिनचर्या अल सुबह ही शुरू हो जाती है। प्रतिदिन मार्निंग वॉक एवं घर में बनाए जिम में वे एक्सरसाइज करते है। शहर में संपूर्ण जांच के लिए एक सेंटर की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध है जहां पेशेंट को नाम मात्र शुल्क पर ही समस्त जांच उपलब्ध हो सकेगी। इस दिशा में उनके प्रयास संत रिचर्ड पंपुराी अस्पताल से प्रारंभ भी हो गए है। साहित्य के प्रति उनका गहरा लगाव है और फुर्सत के समय वे प्रेरणादायक किताबें पढऩा पसंद करते है।
POSTED BY jaishreedadajiworldnews.com
"TRANSLATE YOUR OWN LANGUAGE"
