हरसूद को बचाने के लिए गांव वालों ने 56 लोगों को स्टे लेने भेजा था जबलपुर हाईकोर्ट, वे भोपाल चले गए और बढ़वा लाए खुद का मुआवजा
वासुदेव चौहान | खंडवा
शहर में कई चौराहे होते हैं। उनका नामकरण किसी नेता, संत या स्थानीय व्यक्ति के नाम पर होता है, लेकिन एक चौराहा ऐसा भी है जिसका नाम इसलिए फीलगुड (अच्छा महसूस करना) रखा, ताकि लोग जब भी यहां से गुजरे बैड फील (धोखा और दर्द को महसूस कर सकें) कर सकें। यह दर्द है डूब प्रभावित हरसूद के लोगों का। यह चौराहा छनेरा और हरसूद की बॉर्डर पर है। डूब प्रभावित जब भी यहां से गुजरते हैं तो उन 56 लोगों को भी याद करते हैं, जो हरसूद को डुबोने के लिए जिम्मेदार थे। फीलगुड चौराहे का नाम बदलने के लिए कुछ लोगों ने वहां बोर्ड भी लगा दिया, लेकिन नए हरसूद के लोग अब भी इसे फीलगुड चौराहे के नाम से ही पुकारते हैं।
खंडवा से 50 किमी दूर स्थित है छनेरा और नया हरसूद। जो भी वहां जाता है, फीलगुड चौराहे का नाम सुनकर चौंक जाता है। थोड़ा अच्छा महसूस भी करता है, लेकिन जब उसे पता चलता है कि इसका नाम धोखा और दर्द महसूस करने लिए रखा गया है तो दुख भी जताता है।
वो 56 लोग और फीलगुड चौराहा की कहानी
स्थानीय निवासी रफीक भाई और मुकेश शर्मा बताते हैं सरकारी आदेश के मुताबिक 30 जून 2004 को हरसूद डूबना था। इसके लिए हमें 2003-04 में नोटिस मिला। हरसूद को बचाने के लिए नगर में संगठन बना। जबलपुर हाईकोर्ट में स्टे लगाने की तैयारी करना थी। इसके लिए चंदा एकत्रित करना शुरू किया। चिमटा रैली निकाली, स्पीकर से भी एनाउंसमेंट कराया, डोंडी भी पिटवाई। इस दौरान 67 हजार रुपए एकत्रित हुए। 56 लोगों को आगे कर जबलपुर भेजने की तैयारी हुई। ये लोग ट्रेन में भी बैठे। इन लोगों को जाना था जबलपुर, पहुंच गए भोपाल। यहां इन 56 लोगों ने मंत्री से मुलाकात कर अपना-अपना मुआवजा बढ़वा लिया और वापस हरसूद लौट आए। हाईकोर्ट में स्टे लगाने के बारे में जब इन लोगों से पूछा गया तो जवाब नहीं मिला। 67 हजार रुपए का भी कोई हिसाब नहीं दिया। इन लोगों ने खुद ही अपने मकान तोड़ना शुरू कर दिए। हम लोग जैसे ठगा-सा महसूस करने लगे। मजबूरन थोड़े-बहुत मुआवजे में हमें भी अपने आशियाने छोड़कर नए हरसूद में विस्थापित होना पड़ा। 1 जुलाई 2004 को नए हरसूद के चौराहे का नाम फीलगुड रखा गया, ताकि जो भी यहां से गुजरे उन 56 लाेगों की धोखेबाजी को याद कर दर्द महसूस कर सकें।
Source Dainik Bhaskar Khandwa
वासुदेव चौहान | खंडवा
शहर में कई चौराहे होते हैं। उनका नामकरण किसी नेता, संत या स्थानीय व्यक्ति के नाम पर होता है, लेकिन एक चौराहा ऐसा भी है जिसका नाम इसलिए फीलगुड (अच्छा महसूस करना) रखा, ताकि लोग जब भी यहां से गुजरे बैड फील (धोखा और दर्द को महसूस कर सकें) कर सकें। यह दर्द है डूब प्रभावित हरसूद के लोगों का। यह चौराहा छनेरा और हरसूद की बॉर्डर पर है। डूब प्रभावित जब भी यहां से गुजरते हैं तो उन 56 लोगों को भी याद करते हैं, जो हरसूद को डुबोने के लिए जिम्मेदार थे। फीलगुड चौराहे का नाम बदलने के लिए कुछ लोगों ने वहां बोर्ड भी लगा दिया, लेकिन नए हरसूद के लोग अब भी इसे फीलगुड चौराहे के नाम से ही पुकारते हैं।
खंडवा से 50 किमी दूर स्थित है छनेरा और नया हरसूद। जो भी वहां जाता है, फीलगुड चौराहे का नाम सुनकर चौंक जाता है। थोड़ा अच्छा महसूस भी करता है, लेकिन जब उसे पता चलता है कि इसका नाम धोखा और दर्द महसूस करने लिए रखा गया है तो दुख भी जताता है।
वो 56 लोग और फीलगुड चौराहा की कहानी
स्थानीय निवासी रफीक भाई और मुकेश शर्मा बताते हैं सरकारी आदेश के मुताबिक 30 जून 2004 को हरसूद डूबना था। इसके लिए हमें 2003-04 में नोटिस मिला। हरसूद को बचाने के लिए नगर में संगठन बना। जबलपुर हाईकोर्ट में स्टे लगाने की तैयारी करना थी। इसके लिए चंदा एकत्रित करना शुरू किया। चिमटा रैली निकाली, स्पीकर से भी एनाउंसमेंट कराया, डोंडी भी पिटवाई। इस दौरान 67 हजार रुपए एकत्रित हुए। 56 लोगों को आगे कर जबलपुर भेजने की तैयारी हुई। ये लोग ट्रेन में भी बैठे। इन लोगों को जाना था जबलपुर, पहुंच गए भोपाल। यहां इन 56 लोगों ने मंत्री से मुलाकात कर अपना-अपना मुआवजा बढ़वा लिया और वापस हरसूद लौट आए। हाईकोर्ट में स्टे लगाने के बारे में जब इन लोगों से पूछा गया तो जवाब नहीं मिला। 67 हजार रुपए का भी कोई हिसाब नहीं दिया। इन लोगों ने खुद ही अपने मकान तोड़ना शुरू कर दिए। हम लोग जैसे ठगा-सा महसूस करने लगे। मजबूरन थोड़े-बहुत मुआवजे में हमें भी अपने आशियाने छोड़कर नए हरसूद में विस्थापित होना पड़ा। 1 जुलाई 2004 को नए हरसूद के चौराहे का नाम फीलगुड रखा गया, ताकि जो भी यहां से गुजरे उन 56 लाेगों की धोखेबाजी को याद कर दर्द महसूस कर सकें।
Source Dainik Bhaskar Khandwa