Saturday, 26 March 2016

राष्ट्रगान के समय की बाध्यता समाप्त हो

सेवापथ संस्थान के नरेन्द्र अग्रवाल ने राष्ट्रपति, चीफ  जस्टिस व प्रधानमंत्री को लिखा पत्र
खण्डवा। राष्ट्रगान की निर्धारित समय सीमा 52 सेकण्ड है। यह बाध्यता देश के कई लोगो को कानूनी शिकंजे में जकड देती है। इस समयावधी को संसद में प्रस्ताव लाकर समाप्त करने की मांग उठी है। सेवापथ संस्थान के अध्यक्ष नरेन्द्र अग्रवाल ने राष्ट्रपति, सुप्रिम कोर्ट के मुख्य न्यायाधिपति सहित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से राष्ट्रगान के समय एवं उच्चारण से संबंधित बाध्यता समाप्त करने मांग की है।
अग्रवाल ने लिखा है कि, '' राष्ट्रगान गाने वाले व्यक्ति के लिए 52 सेकण्ड में उसे पूरा करने की बाध्यता, उसकी भावनात्मक अभिव्यक्त की स्वतंत्रता में बाधक है। व्यावहारिक जीवन में यह समय-सीमा का बंधन अव्यवहारिक है। हर उम्र के व्यक्ति को राष्ट्रगान गाने में अलग-अलग समय लगता है। कभी-कभी तो लय एवं ताल में भी अंतर देखने को मिलता है। तथा शब्दों का उच्चारण भी भिन्न हो जाता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए की राष्ट्रगान गाने वाले व्यक्ति नें राष्ट्रगान का अपमान किया है। बल्कि यह देखा जाना जरुरी है कि राष्ट्रगान गाने वाले व्यक्ति ने राष्ट्रगान राष्ट्रप्रेम के लिए समर्पित होकर गाया है।
राष्ट्रगान गाने के लिए कोई भी व्यक्ति बारबार घडी नहीं देखता, समय पूर्ण होने पर गान को बीच में अधूरा नहीं छोडा जा सकता। समय-सीमा को हथियार बनाकर सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में लोग राष्ट्रगान गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ  शिकायत दर्ज करा देते है। इस प्रकार की घटनाओं से आम जनता भी राष्ट्रगान गाने से कतराने लगेगी और राष्ट्रगान मात्र एक सरकारी कार्यक्रमों की औपचारिकता बनकर रह जाएगा। जहॉ देश-भक्ति और प्रेम का संबंध हो वहॉ समय नहीं, सर्मपण देखा जाना चाहिए।
पत्र में कहा कि, यदि इस प्रकार की सस्ती लोकप्रियता की घटनाओं को हतोत्साहित कर नहीं रोका गया तो राष्ट्रद्रोही ताकते कानून को हथियार बनाकर राष्ट्रभक्तों को कुचलने में देर नहीं करेंगी। मात्र समय-सीमा का बंधन या चंद शब्दों का सही उच्चारण नहीं होने के भय से राष्ट्रगान गाने वाले व्यक्ति राष्ट्रगान से कतराने लगेंगे, जो राष्ट्र की अपूरणिय क्षति होगी। राष्ट्रभक्ति,राष्ट्रवाद,राष्ट्
रगान एवं राष्ट्रध्वज किसी कानूनी बाध्यता या संहिता के अधीन न होकर मार्गदर्शक सिद्धान्तों के माध्यम से राष्ट्रभक्ति की भावनाओं को प्रदर्शित करने का अधिकार होना चाहिए। प्रधानमंत्री को लिए गए पत्र में कहा है कि,आवश्यक हो तो संसद से कानून पारित कराए।